Monday, 13 January 2020

रात-चाँदनी आज धुंधली है 
मन का कमरा भी खाली है 
बादलों के रुख़ से पता लगता है 
तेरा कहना अभी बाक़ी है
हम बैठे हैं इंतजार में, तु चलेगा साथ मेरे 
लेकिन आज भी हाथ खाली है 

ख्याल


इतनी जल्दी जाना है ?
अभी तो तुम आई हो
अभी ठीक से सोचा नहीं, शब्दों में पिरोया नहीं
उसने अभी देखा नहीं, यादों में बसा नहीं
और तुम कहती हो जाना है ?

खिलवाड़

अपना बोरी-बिस्तरा लिए रोडवेज कि बस के आख़िरी पायदान पर पहुँचा तो देहरादून ने ठंड की तेज हवाओं के साथ मिलकर स्वागत किया, मानों दोनों अपनी सीमाएं लांधने को तैयार हो
पुराने दिनों से बिलकुल अलग, बेचैनी से देखता हुआ देहरादून मेरे हाथों को थाम कर बोला
राम-लक्ष्मण होने का साक्षी हूँ मैं,
ॠष्यों की तपोभूमि हूँ मैं
उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों तक
पूर्व में गंगा से लेकर पश्चिम में यमुना जलधारा तक
प्रकृति द्वारा बनाई गई विशाल सीमाओं से घिरा हूँ मैं
अपने आगोश में संस्कृति को समेटे हुए प्रकृति का सच्चा साथी हूँ मैं
इन करूणा भरीं आँखों से देखता हुआ देहरादून
अपनी व्याकुलता को टेढ़ेपन के लिबास में लपेट कर उलटे कदमों से चल पड़ा
मैंने कुछ कहना चाहा, पर उसे रोक ना सका
लेकिन जाता कहाँ, आज भी वो बाहर से झाँकता है, साथ छोड़ता ही नहीं
गलती किसी ओर की नहीं हमारी है
विकास के प्रति हमारी समझ और उसकी परिभाषा को समझाने में हम ऐसे उलझे हुए हैं कि इससे होंने वाले विनाश को हम देख नहीं पा रहे
हम आगे तो निकल रहे हैं पर पीछे जो छूटता जा रहा है
उसी से हमारा सृजन है वही हमारा अस्तित्व है
इसकी जड़ हमारी शिक्षा में छिपा है
आज हमारी शिक्षा हमें उन बुलंदियों तक पहुंचा सकती है पर प्रकृति से प्रेम करना नहीं
हमारी शिक्षा हमें स्वार्थी और गुलाम बना रही है
शिक्षा ने हमारे सामने प्रतिस्पर्धा का ऐसा माहौल तैयार किया है जहाँ सिर्फ हम अपने बारे में सोचते हैं
शिक्षा !
हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाऐ जहाँ हम बेहतर कल कल्पना कर सकें। हमें अपनी हद और प्रकृति के द्वारा बनाऐ गऐ अन्य जीवों का सम्मान करना और सम्पूर्ण रक्षा करना हमारा सर्वप्रथम कार्य होना चाहिए
नहीं तो देहरादून की तरह कोई और बेबस होगा
जिस दिन ये रूठ गए, उस दिन हम नहीं होगें 

Sunday, 16 December 2018

जब हम बच्चों को भगवान का स्वरूप मानते हैं
तो हम उन पर अपनी मान्यताएं क्यों थोपते हैं

सतीsh

Thursday, 20 September 2018

बादल

नीले आसमां में बादल का कारवां
जेठ दुपहरी में आ गया
श्वेत-सी सूरत
धुंधला-सा
एकदम सुखा-सुकडा
तड़पते देखा
छटकते देखा
एक बूँद का प्यासा
अथाह गागर लिए
खुली है धरती तेरे सामने
डूब जा
सुखा ले सारी मस्तियाँ
जेठ देखेगा,जलेगा
तेरा भी अभिमान है
अहंकार है
घेर ले चारों ओर से
निगल जा नभ का तारा
कर दे अंधियार
अपनी बैछारों के वेग से
तोड़ दे अचल का सिना
उड़ेल दे छोटी धारा में यौवन
चंचल कर दे उसका मन
लांघ ले वो किनारों कों
फिर चल हो जा रवाँ
नीले आसमां में बादल का कारवां

जय हिन्द

Wednesday, 12 September 2018

मन
पांच अश्व का सारथी तु
नयन मूँदे बैठा मैं
तेरे उपद्रव के कारण
अकारण ही घिर जाता मैं
अस्तित्व अदृश्य है तेरा
शून्य से सृजन मेरा
भावों के जगत से तु
ज्ञान का भंडार मेरा
कर्म की बेडियाँ लगाए
पाप पुण्य का हिसाब मांगे
समय चक्र बलवान है
तू भी कितना महान है 
विषयों के चिंतन से 
आसक्ति  प्राप्त होता है

जय हिन्द



Thursday, 30 August 2018

सवेरा 
सीलन से भरी कोठरी
टपकती बूंदें रिस्ता पानी
खड़ी दीवारें कांपती सारी
सदियों से
उसी वेग से
उसी स्थान पर
यहाँ हर क्षण है परिवर्तन
तू वहीं खड़ा है
पकड़ उजियारा
निकल बाहर
भेद ले अंतर्मन तक
कर्म के तीरों कों
बह जाने दे लहू
घृणा का
स्वार्थ का
पक्षपात का
अहंकार का
तभी होगा सवेरा
नया सवेरा

जय हिन्द