Sunday, 16 December 2018

जब हम बच्चों को भगवान का स्वरूप मानते हैं
तो हम उन पर अपनी मान्यताएं क्यों थोपते हैं

सतीsh

Thursday, 20 September 2018

बादल

नीले आसमां में बादल का कारवां
जेठ दुपहरी में आ गया
श्वेत-सी सूरत
धुंधला-सा
एकदम सुखा-सुकडा
तड़पते देखा
छटकते देखा
एक बूँद का प्यासा
अथाह गागर लिए
खुली है धरती तेरे सामने
डूब जा
सुखा ले सारी मस्तियाँ
जेठ देखेगा,जलेगा
तेरा भी अभिमान है
अहंकार है
घेर ले चारों ओर से
निगल जा नभ का तारा
कर दे अंधियार
अपनी बैछारों के वेग से
तोड़ दे अचल का सिना
उड़ेल दे छोटी धारा में यौवन
चंचल कर दे उसका मन
लांघ ले वो किनारों कों
फिर चल हो जा रवाँ
नीले आसमां में बादल का कारवां

जय हिन्द

Wednesday, 12 September 2018

मन
पांच अश्व का सारथी तु
नयन मूँदे बैठा मैं
तेरे उपद्रव के कारण
अकारण ही घिर जाता मैं
अस्तित्व अदृश्य है तेरा
शून्य से सृजन मेरा
भावों के जगत से तु
ज्ञान का भंडार मेरा
कर्म की बेडियाँ लगाए
पाप पुण्य का हिसाब मांगे
समय चक्र बलवान है
तू भी कितना महान है 
विषयों के चिंतन से 
आसक्ति  प्राप्त होता है

जय हिन्द



Thursday, 30 August 2018

सवेरा 
सीलन से भरी कोठरी
टपकती बूंदें रिस्ता पानी
खड़ी दीवारें कांपती सारी
सदियों से
उसी वेग से
उसी स्थान पर
यहाँ हर क्षण है परिवर्तन
तू वहीं खड़ा है
पकड़ उजियारा
निकल बाहर
भेद ले अंतर्मन तक
कर्म के तीरों कों
बह जाने दे लहू
घृणा का
स्वार्थ का
पक्षपात का
अहंकार का
तभी होगा सवेरा
नया सवेरा

जय हिन्द


Friday, 24 August 2018

बूँद

बूँदों का समंदर
एक बूँद छिटक गई,
मरूधरा पर
गिरते ही समर्पित,
हवा के साथ  घुलकर
बूंद का अस्थिपंजर,
 बिलकुल सुखी,जर्जर
छूआ तों टूट गई,
बिखर गई
वो तो रेत थीं रेत
जय हिन्द

Wednesday, 22 August 2018

मैं

 मैं
आज बेचैन हूँ, नीरस हूँ
अपनें कल से,आनें वाले कल से
अपनी आँखों को चुराते हुए
आँगन से,उन गलियों से
उन चेहरो से, जो बचपन में देखा करते थे
आसमां एक
जमीं एक
पर्वत एक
झरनें एक
नदी, समंदर एक
प्रकृति का नियम एक, मनुष्य भी एक
फिर मैं कहां छूट गया, टूट गया
क्या अपनें चेतन मन से
बाहरी ज्ञान से, आश्वासनों से
लगाव से, अपेक्षाओं से
विश्वास से या अपनी ईमानदारी से
मैं डूबा नहीं हूँ , डूब रहा हूँ
ठहरूगां, सम्भलुगां,
फिर कल निकलुगां,
दमकते हुए, चहचहाते हुए
कल कल कि आवाज़ सुनाते हुए
कोपलों को खिलाते हुए
भीनी-सी खुशबू महकाते हुए
लेकिन आज मैं बेचैन हूँ नीरस हूँ

जय हिन्द



Sunday, 19 August 2018

मैं  दीप जलाना चाहता हूँ।
सरहद के उन अथाह वन में,
जहाँ स्वर सुनाई देते हैं
दृश्य है क्षणभंगुर।
मैं  दीप जलाना चाहता हूँ।
अचल के उस बिंदु पर,
रक्त-चिन्ह हैं जहाँ मित्रों का।
मैं  दीप जलाना चाहता हूँ।
प्रांगण का उजियारा देकर,
कुटी किया जिसनें अंधियारा।


जय हिन्द 

Friday, 17 August 2018

एक फूल मासूम- सा
आतुर बडा। नीरस खडा।
बौछारों की उम्मीद लगाए।
अपनें अरुक्ष  करों  को
नभ समान फैलाए खडा।
अंजलि में एक बूँद गिरा कर
काला जलधर इठलाए बडा।
एक फूल मासूम- सा
आतुर बडा। नीरस खडा।





Tuesday, 14 August 2018

सोच नहीं है मेरी परे
इन कर्तव्यों को कैसे उठाऊँगा
धीरे-धीरे इस मिट्टी में
धुलते - मिलते जाऊँगा