Thursday, 30 August 2018
Friday, 24 August 2018
बूँद
बूँदों का समंदर
एक बूँद छिटक गई,
मरूधरा पर
गिरते ही समर्पित,
हवा के साथ घुलकर
बूंद का अस्थिपंजर,
बिलकुल सुखी,जर्जर
छूआ तों टूट गई,
बिखर गई
वो तो रेत थीं रेत
जय हिन्द
एक बूँद छिटक गई,
मरूधरा पर
गिरते ही समर्पित,
हवा के साथ घुलकर
बूंद का अस्थिपंजर,
बिलकुल सुखी,जर्जर
छूआ तों टूट गई,
बिखर गई
वो तो रेत थीं रेत
जय हिन्द
Wednesday, 22 August 2018
मैं
मैं
आज बेचैन हूँ, नीरस हूँ
अपनें कल से,आनें वाले कल से
अपनी आँखों को चुराते हुए
आँगन से,उन गलियों से
उन चेहरो से, जो बचपन में देखा करते थे
आसमां एक
जमीं एक
पर्वत एक
झरनें एक
नदी, समंदर एक
प्रकृति का नियम एक, मनुष्य भी एक
फिर मैं कहां छूट गया, टूट गया
क्या अपनें चेतन मन से
बाहरी ज्ञान से, आश्वासनों से
लगाव से, अपेक्षाओं से
विश्वास से या अपनी ईमानदारी से
मैं डूबा नहीं हूँ , डूब रहा हूँ
ठहरूगां, सम्भलुगां,
फिर कल निकलुगां,
दमकते हुए, चहचहाते हुए
कल कल कि आवाज़ सुनाते हुए
कोपलों को खिलाते हुए
भीनी-सी खुशबू महकाते हुए
लेकिन आज मैं बेचैन हूँ नीरस हूँ
जय हिन्द
आज बेचैन हूँ, नीरस हूँ
अपनें कल से,आनें वाले कल से
अपनी आँखों को चुराते हुए
आँगन से,उन गलियों से
उन चेहरो से, जो बचपन में देखा करते थे
आसमां एक
जमीं एक
पर्वत एक
झरनें एक
नदी, समंदर एक
प्रकृति का नियम एक, मनुष्य भी एक
फिर मैं कहां छूट गया, टूट गया
क्या अपनें चेतन मन से
बाहरी ज्ञान से, आश्वासनों से
लगाव से, अपेक्षाओं से
विश्वास से या अपनी ईमानदारी से
मैं डूबा नहीं हूँ , डूब रहा हूँ
ठहरूगां, सम्भलुगां,
फिर कल निकलुगां,
दमकते हुए, चहचहाते हुए
कल कल कि आवाज़ सुनाते हुए
कोपलों को खिलाते हुए
भीनी-सी खुशबू महकाते हुए
लेकिन आज मैं बेचैन हूँ नीरस हूँ
जय हिन्द
Sunday, 19 August 2018
Friday, 17 August 2018
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