Wednesday, 22 August 2018

मैं

 मैं
आज बेचैन हूँ, नीरस हूँ
अपनें कल से,आनें वाले कल से
अपनी आँखों को चुराते हुए
आँगन से,उन गलियों से
उन चेहरो से, जो बचपन में देखा करते थे
आसमां एक
जमीं एक
पर्वत एक
झरनें एक
नदी, समंदर एक
प्रकृति का नियम एक, मनुष्य भी एक
फिर मैं कहां छूट गया, टूट गया
क्या अपनें चेतन मन से
बाहरी ज्ञान से, आश्वासनों से
लगाव से, अपेक्षाओं से
विश्वास से या अपनी ईमानदारी से
मैं डूबा नहीं हूँ , डूब रहा हूँ
ठहरूगां, सम्भलुगां,
फिर कल निकलुगां,
दमकते हुए, चहचहाते हुए
कल कल कि आवाज़ सुनाते हुए
कोपलों को खिलाते हुए
भीनी-सी खुशबू महकाते हुए
लेकिन आज मैं बेचैन हूँ नीरस हूँ

जय हिन्द



4 comments:

  1. मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !
    वक़्त मिले तो हमारे ब्लॉग पर भी आयें|
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद सर

      Delete
  2. बहुत सुन्दर रचना ।

    ReplyDelete