बूँदों का समंदर
एक बूँद छिटक गई,
मरूधरा पर
गिरते ही समर्पित,
हवा के साथ घुलकर
बूंद का अस्थिपंजर,
बिलकुल सुखी,जर्जर
छूआ तों टूट गई,
बिखर गई
वो तो रेत थीं रेत
जय हिन्द
एक बूँद छिटक गई,
मरूधरा पर
गिरते ही समर्पित,
हवा के साथ घुलकर
बूंद का अस्थिपंजर,
बिलकुल सुखी,जर्जर
छूआ तों टूट गई,
बिखर गई
वो तो रेत थीं रेत
जय हिन्द
बहुत सुन्दर रचना सतीश सही जी ।
ReplyDeleteधन्यवाद मीना जी
Deleteधन्यवाद्
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ReplyDelete... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Deleteसुंदर रचना
ReplyDeleteआभार
ReplyDeleteबहुत सुंदर।
ReplyDeleteआभार
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