सवेरा
सीलन से भरी कोठरी
टपकती बूंदें रिस्ता पानी
खड़ी दीवारें कांपती सारी
सदियों से
उसी वेग से
उसी स्थान पर
यहाँ हर क्षण है परिवर्तन
तू वहीं खड़ा है
पकड़ उजियारा
निकल बाहर
भेद ले अंतर्मन तक
कर्म के तीरों कों
बह जाने दे लहू
घृणा का
स्वार्थ का
पक्षपात का
अहंकार का
तभी होगा सवेरा
नया सवेरा
जय हिन्द
बहुत सुन्दर रचना ।
ReplyDeleteआभार
Deleteधन्यवाद मीना जी
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