मैं दीप जलाना चाहता हूँ।
सरहद के उन अथाह वन में,
जहाँ स्वर सुनाई देते हैं
दृश्य है क्षणभंगुर।
मैं दीप जलाना चाहता हूँ।
अचल के उस बिंदु पर,
रक्त-चिन्ह हैं जहाँ मित्रों का।
मैं दीप जलाना चाहता हूँ।
प्रांगण का उजियारा देकर,
कुटी किया जिसनें अंधियारा।
जय हिन्द
सरहद के उन अथाह वन में,
जहाँ स्वर सुनाई देते हैं
दृश्य है क्षणभंगुर।
मैं दीप जलाना चाहता हूँ।
अचल के उस बिंदु पर,
रक्त-चिन्ह हैं जहाँ मित्रों का।
मैं दीप जलाना चाहता हूँ।
प्रांगण का उजियारा देकर,
कुटी किया जिसनें अंधियारा।
जय हिन्द
बहुत बढ़िया
ReplyDeleteशुक्रिया सर
Deleteबहुत सुन्दर...
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