Wednesday, 12 September 2018

मन
पांच अश्व का सारथी तु
नयन मूँदे बैठा मैं
तेरे उपद्रव के कारण
अकारण ही घिर जाता मैं
अस्तित्व अदृश्य है तेरा
शून्य से सृजन मेरा
भावों के जगत से तु
ज्ञान का भंडार मेरा
कर्म की बेडियाँ लगाए
पाप पुण्य का हिसाब मांगे
समय चक्र बलवान है
तू भी कितना महान है 
विषयों के चिंतन से 
आसक्ति  प्राप्त होता है

जय हिन्द



4 comments:

  1. शुभ संध्या सतीष जी
    बढ़िया...
    गूगल फॉलाेव्हर का गैजैट लगाइए
    सादर

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    1. धन्यवाद यशोदा जी
      क्षमाप्रार्थी हूँ
      गूगल फाॅलोव्हर का गैजैट कैसे लगायें
      मुझे नहीं आता

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  2. ये मन ही है जो ये सब करता है ... सभी दिशाओं में जाता है ..
    सुन्दर रचना ...

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