मन
पांच अश्व का सारथी तु
नयन मूँदे बैठा मैं
तेरे उपद्रव के कारण
अकारण ही घिर जाता मैं
अस्तित्व अदृश्य है तेरा
शून्य से सृजन मेरा
भावों के जगत से तु
ज्ञान का भंडार मेरा
कर्म की बेडियाँ लगाए
पाप पुण्य का हिसाब मांगे
समय चक्र बलवान है
तू भी कितना महान है
नयन मूँदे बैठा मैं
तेरे उपद्रव के कारण
अकारण ही घिर जाता मैं
अस्तित्व अदृश्य है तेरा
शून्य से सृजन मेरा
भावों के जगत से तु
ज्ञान का भंडार मेरा
कर्म की बेडियाँ लगाए
पाप पुण्य का हिसाब मांगे
समय चक्र बलवान है
तू भी कितना महान है
विषयों के चिंतन से

शुभ संध्या सतीष जी
ReplyDeleteबढ़िया...
गूगल फॉलाेव्हर का गैजैट लगाइए
सादर
धन्यवाद यशोदा जी
Deleteक्षमाप्रार्थी हूँ
गूगल फाॅलोव्हर का गैजैट कैसे लगायें
मुझे नहीं आता
ये मन ही है जो ये सब करता है ... सभी दिशाओं में जाता है ..
ReplyDeleteसुन्दर रचना ...
धन्यवाद सर
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