अपना बोरी-बिस्तरा लिए रोडवेज कि बस के आख़िरी पायदान पर पहुँचा तो देहरादून ने ठंड की तेज हवाओं के साथ मिलकर स्वागत किया, मानों दोनों अपनी सीमाएं लांधने को तैयार हो
पुराने दिनों से बिलकुल अलग, बेचैनी से देखता हुआ देहरादून मेरे हाथों को थाम कर बोला
राम-लक्ष्मण होने का साक्षी हूँ मैं,
ॠष्यों की तपोभूमि हूँ मैं
उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों तक
पूर्व में गंगा से लेकर पश्चिम में यमुना जलधारा तक
प्रकृति द्वारा बनाई गई विशाल सीमाओं से घिरा हूँ मैं
अपने आगोश में संस्कृति को समेटे हुए प्रकृति का सच्चा साथी हूँ मैं
इन करूणा भरीं आँखों से देखता हुआ देहरादून
अपनी व्याकुलता को टेढ़ेपन के लिबास में लपेट कर उलटे कदमों से चल पड़ा
मैंने कुछ कहना चाहा, पर उसे रोक ना सका
लेकिन जाता कहाँ, आज भी वो बाहर से झाँकता है, साथ छोड़ता ही नहीं
गलती किसी ओर की नहीं हमारी है
विकास के प्रति हमारी समझ और उसकी परिभाषा को समझाने में हम ऐसे उलझे हुए हैं कि इससे होंने वाले विनाश को हम देख नहीं पा रहे
हम आगे तो निकल रहे हैं पर पीछे जो छूटता जा रहा है
उसी से हमारा सृजन है वही हमारा अस्तित्व है
इसकी जड़ हमारी शिक्षा में छिपा है
आज हमारी शिक्षा हमें उन बुलंदियों तक पहुंचा सकती है पर प्रकृति से प्रेम करना नहीं
हमारी शिक्षा हमें स्वार्थी और गुलाम बना रही है
शिक्षा ने हमारे सामने प्रतिस्पर्धा का ऐसा माहौल तैयार किया है जहाँ सिर्फ हम अपने बारे में सोचते हैं
शिक्षा !
हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाऐ जहाँ हम बेहतर कल कल्पना कर सकें। हमें अपनी हद और प्रकृति के द्वारा बनाऐ गऐ अन्य जीवों का सम्मान करना और सम्पूर्ण रक्षा करना हमारा सर्वप्रथम कार्य होना चाहिए
नहीं तो देहरादून की तरह कोई और बेबस होगा
जिस दिन ये रूठ गए, उस दिन हम नहीं होगें
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